कर्मयोगी पं. माधवराव सप्रे


 

 


 

राष्ट्रभाषा हिन्दी के उन्नायक, प्रखर चिंतक, मनीषी संपादक, स्वतंत्राता संग्राम सेनानी और सार्वजनिक कार्यों के लिये समर्पित कार्यकर्ताओं की श्रृंखला तैयार करने वाले प्रेरक-मार्गदर्शक-गुरु कर्मयोगी पं. माधवराव सप्रे का कृतित्व और अवदान कालजयी है। पं. माधवराव सप्रे ने छत्तीसगढ़ मित्रा (1900), हिन्दी ग्रंथ माला (1906) और हिन्दी केसरी (1907) का सम्पादन प्रकाशन कर हिन्दी पत्राकारिता और साहित्य को नये संस्कार प्रदान किए। नागरी प्रचारिणी सभा काशी की विशाल शब्दकोश योजना के अन्तर्गत आर्थिक शब्दावली के निर्माण का महत्वपूर्ण कार्य सप्रे जी ने किया। मराठी की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृतियों में से ' दासबोध ', ' गीतारहस्य ' और ' महाभारत  मीमांसा ' के प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद सप्रेजी ने किये। कर्मवीर का प्रकाशन उन्हीं ने कराया और उसके सम्पादक के रूप में माखनलाल चतुर्वेदी जैसा तेजस्वी सम्पादक हिन्दी संसार को दिया। 1924 के देहरादून हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता पं.माधवराव सप्रे ने की। उनका एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवदान स्वतंत्राता संग्राम, हिन्दी की सेवा और सामाजिक कार्यों के लिए सैकड़ों समर्पित कार्यकर्त्ताओं की श्रृंखला तैयार करना है।
19 जून 1984 को राष्ट्र की बौद्धिक धरोहर को संजोने और भावी पीढ़ियों की अमानत के रूप में संरक्षित करने के लिये जब एक अनूठे संग्रहालय की स्थापना का विचार फलीभूत हुआ तब सप्रे जी के कृतित्व के प्रति आदर और कृतज्ञता अभिव्यक्त करने के लिये संस्थान को
' माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय '
नाम दिया गया।